bal vikas study material / bal vikas or shiksha shastra pdf notes in Hindi

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PART -14 
 
 


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नमस्कार दोस्तों , इस आर्टिकल में हमने  ” bal vikas study material / bal vikas or shiksha shastra pdf notes in Hindi” के प्रश्नों का एक – एक करके संकलन किया है। साथ ही इस पीडीऍफ़ में हमने ” बाल विकास और शिक्षा शास्त्र ” के सभी topics को विषयवार cover किया है। इस नोट्स की विशेषता यह है , कि – इसमें आपको पढ़ने , समझने और याद करने में आसानी होगी। कियोकि इन नोट्स को आपके बालविकास एवं  शिक्षा – शास्त्र को समझने और याद करने की समस्याओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है।
(1 ) पाठ्यक्रम -FACT –
→ बाल – केंद्रित शिक्षा के अंतरगर्त एक शिक्षक को बालक की आवश्यकताएं क्या है ,अथवा किस प्रकार की है उनको समझना होता है। 
→ बाल – केंद्रित शिक्षा प्रणाली में शिक्षक को उस समाज को भी समझना होता है।  जहां शिक्षा दी जा रही है।,साथ ही उस समाज की शिक्षा से सम्बंधित क्या आवश्यकताएं है।
→ बाल केंद्रित पाठ्यक्रम को बनाते  समय बालक तथा उस समाज को ध्यान में रखा जाता है ,जिसके लिए पाठ्यक्रम बनाया जा रहा है। 
(2 ) बाल – केंद्रित शिक्षा में बाल मनोविज्ञान 




→ बाल केन्द्रित शिक्षा प्रणाली में – शिक्षा को लेकर शिक्षक विभिन्न प्रकार के प्रयोग अथवा अनुसंधान करता है।  जो कि  – ” बाल – मनोविज्ञान ” के अंतरगर्त आते है।
→  शिक्षक  कक्षा में अनुशासन  एवं व्यवस्था बनाये रखने के लिए  – बाल – मनोविज्ञान का प्रयोग कर सकता है।
→  बाल – मनोविज्ञान शिक्षक को किसी भी बालक के व्यवहार को  समझने में सहायता करता है।
→ शिक्षक बाल – मनोविज्ञान की समझ द्वारा स्वयं और छात्र के बीच ,सम्बन्धो को बेहतर कर सकता है।
→ बाल – मनोविज्ञान द्वारा शिक्षक – बालक की आवश्यकताओं को समझ कर। उस सम्बन्ध में कार्य कर सकता है।
→  बाल -मनोविज्ञान की समझ द्वारा शिक्षक एक बेहतर कल का निर्माण कर सकता है।
(3) बाल – केंद्रित शिक्षा प्रणाली की विशेषताएँ –

➟ बाल – केंद्रित शिक्षा प्रणाली के अंतरगर्त बालक के सर्वागीण विकास पर बल दिया जाता है।

➠ बाल – केंद्रित शिक्षा प्रणाली के अंतरगर्त – बालक और उसके व्यवहार को विस्तृत रूप में समझा जाता है। 
➠ बाल केंद्रित शिक्षा प्रणाली के अंतरगर्त – बालक की शिक्षा में आने वाली बाधाओं को दूर किया जाता है।

➠ इसके साथ ही – बाल -केंद्रित शिक्षा के अंतरगर्त – विभिन्न प्रकार की समस्याओं को अच्छी  तरह से समझ कर उन्हें दूर करने का प्रयास किया जाता है। 



(4  )  प्रगतिशील शिक्षा अथवा  प्रयोगवादी  शिक्षा  से सम्बंधित विभिन्न सिद्धांत एवं तथ्य  इस प्रकार है।

➨ प्रगतिशील शिक्षा या प्रयोगवादी से तात्पर्य  – ” शिक्षा का उद्देश्य बालक की शक्तियों का विकास है। “

→ प्रगतिशील शिक्षा में शिक्षक द्वारा  यह प्रयास किया जाता है , कि – बालको में उत्तरदायित्व ही भावना का विकास हो। 
→  मानव जितना अधिक ” मानसिक – क्रियाओ ” का प्रयोग करेगा उतना अधिक उसका विकास होगा।
→मानव  मस्तिष्क के तीन रूप है।
 जिसमे पहला – चिंतन करना

दूसरा – अनुभूति करना और तीसरा – संकल्प करना।
→ प्रगतिशील शिक्षा या प्रयोगवादी के अंतरगर्त – प्रोजेक्ट विधि , समस्या – समाधान विधि , क्रिया – कार्यक्रम आदि विधियों को अपनाया जाता है। 
→ प्रगतिशील शिक्षा या प्रयोगवादी शिक्षा के अनुसार शिक्षक – समाज का सेवक होता है। 
→ इस शिक्षा प्रणाली में – बालक के सीखने की प्रक्रिया पर अधिक बल दिया जाता है।

जॉन डिवी

 

➤ जॉन डिवी– ये सयुक्त राज्य अमेरिका के मनोवैज्ञानिक , शिक्षा – शास्त्री और दार्शनिक थे। इन्होने बालक के लिए प्रगतिशील अथवा प्रयोगवादी शिक्षा प्रणाली को अपनाने पर अधिक बल दिया है। जॉन डिवी “शिक्षक ” को बहुत अधिक महत्व देते है। इन्होने शिक्षकों को प्रगतिशील शिक्षा – को प्रयोग करने पर बल दिया। 



➤ जॉन डिवी  ने – प्रगतिशील शिक्षा या प्रयोगवादी शिक्षा में 2 तरह के तत्वों को आवश्यक माना है। 
(i ) रूचि 
(ii ) प्रयास

व्याख्या – अर्थात – एक शिक्षक अथवा छात्र के लिए
 
 जॉन डिवी के अनुसार – ” शिक्षक समाज में ईश्वर का प्रतिनिधि होते है। “
 जॉन डिवी के अनुसार – “शिक्षा का व्यवहारिक होना अत्यंत आवश्यक होता है। “
 
प्रश्न – उत्तर 

प्रश्न 1 – आधुनिक शिक्षा प्रणाली में क्या ध्यान रखना आवश्यक होता है ?
उत्तर – आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अंतरगर्त निम्न बातो का ध्यान रखा जाता है।
→ बालक की वर्तमान समय में मूल प्रवत्तियाँ क्या है और इससे पहले क्या रही है। 
→ बालक के संवेगो का विकास कैसा है – अर्थात क्या सांवेगिक रूप में बालक का  विकास हुआ है , अथवा नहीं हुआ है।
 
→ आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अंतरगर्त यह भी विशेष रूप से ध्यान रखा जाता है कि बालक के प्रेरणा का स्रोत किस प्रकार का है।
 



प्रश्न 2 – बालक की “मौलिक – प्रवतियों ” से तात्पर्य क्या है ?

 

उत्तर – बालक की मौलिक प्रवत्ति से तात्पर्य – बालक की जो स्वाभाविक आवश्यतकताये अथवा व्यवहार से है। जिसका विकास एक क्रम के अनुसार हुआ है। जैसे कि – किसी मानव द्वारा – भोजन , वस्त्र आदि के लिए जो संघर्ष किया जाता है , वह उस मानव की मौलिक प्रवत्ति बन जाता है।
 
उपरोक्त विवरण के अनुसार हम कह सकते है कि – बाल – केंद्रित शिक्षा प्रणाली में शिक्षक को बाल -मनोविज्ञान का ज्ञान होना आवश्यक होता है। साथ ही शिक्षक को चाहिए कि वो – प्रगतिशील अथवा प्रयोगवादी शिक्षा पर अधिक बल दे। जिससे कि – किसी छात्र को सीखने में आसानी हो और साथ ही साथ वो तीव्र गति से  सीख सके। प्रयोगवादी विधि के अंतरगर्त शिक्षक प्रयोग हेतु विभिन्न उपकरणों का उपयोग कर सकता है। यह विधि आज के समय से हिसाब से व्यवहारिक है और उपयोगी है। अतः इस विधि का प्रयोग बालको के समस्या समाधान में अथवा शीघ्र समझाने में अवश्य करना चाहिए।

 
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