bal vikas or shiksha shastra pdf notes in hindi/किशोरावस्था परिभाषा पीडीएफ

bal vikas or shiksha shastra pdf notes in hindi/किशोरावस्था परिभाषा पीडीएफ

 

 

Bal vikas pdf  Test in Hindi for All Exams ,Ctet/mptet/uptet/Rtet

 

 

bal vikas or shiksha shastra pdf notes in hindi/किशोरावस्था परिभाषा पीडीएफ
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किशोरावस्था परिभाषा पीडीएफ



short notes Part-10  

 

नमस्कार दोस्तों , इस आर्टिकल में हमने “bal vikas or shiksha shastra pdf notes in hindi/किशोरावस्था परिभाषा पीडीएफ” के प्रश्नों का एक – एक करके संकलन किया है। साथ ही इस पीडीऍफ़ में हमने ” बाल विकास और शिक्षा शास्त्र ” के सभी topics को विषयवार cover किया है। इस नोट्स की विशेषता यह है , कि – इसमें आपको पढ़ने , समझने और याद करने में आसानी होगी। कियोकि इन नोट्स को आपके बालविकास एवं  शिक्षा – शास्त्र को समझने और याद करने की समस्याओं को ध्यान में रखकर बनाया गया है। 

किशोरावस्था की परिभाषा

 

किशोरावस्था  से तात्पर्य बालक की उस  अवस्था से होता है ,जो कि बालक के जीवन में बाल्यावस्था  के बाद आती है। अर्थात सामान्य तौर पर कहे तो किशोरावस्था का समयकाल –  12 वर्ष से 18 या 22 वर्ष तक ” माना जाता है। परन्तु इस सम्बन्ध में सभी मनोवैज्ञानिकों अपने अलग – अलग विचार है। 

किशोरावस्था के प्रकार

 

किशोरावस्था का समयकाल – ”  12 वर्ष से 18 वर्ष तक ” का मन जाता है।
  • पूर्व किशोरावस्था – इस अवस्था में जो पूर्व किशोरावस्था होती है  लगभग – 12  वर्ष से 14  वर्ष तक की – उसमे बालको की लम्बाई और भार बढ़ने की तुलना में बालिकाओ की लम्बाई और मांसपेसिया बहुत तेजी से बढ़ती है। अर्थात इस अवस्था में ( पूर्व किशोरावस्था ) में बालिकाओ ( किशोरियों ) की लम्बाई और भार में तेज़ी से वृद्धि एवं विकास देखा जाता है। 
  • उत्तर किशोरावस्था–  ठीक इसके विपरीत उत्तर- किशोरावस्था जो कि – 14 वर्ष की उम्र से 18 वर्ष तक की होती है , उसमे बालिकाओ की अपेक्षाकृत बालको की लम्बाई और मासपेशियों में तेज़ी से वृद्धि देखी जाती है। अर्थात यह समयकाल बालको के शारीरिक और मानसिक विकास के लिए सबसे उपयुक्त होता है। 

किशोरावस्था की प्रमुख विशेषताएं

 

किशोरावस्था  की निम्नलिखित विशेषताएं  होती है।  जो कि  इस प्रकार है। 
(1 ) बुद्धि का पूर्ण विकास होना – बालक एवं बालिकाओ की बुद्धि का पूर्ण विकास इस अवस्था में ही होता है।  इसके साथ ही उनमे स्मरण शक्ति या क्षमता पहले से अधिक तेज़ी से विकसित हो जाती है।  अब उन्हें ध्यान लगाने के लिए अधिक प्रयत्न नहीं करने पड़ते है। इस अवस्था में बालक बहुत ही शीघ्र और बहुत तेज़ी से किसी बात समझ कर उस पर प्रतिक्रिया करते है।  

 

(2 ) सामाजिक जीवन में  बदलाव  –  इस अवस्था में बालक के सामाजिक जीवन में बड़ा बदलाव देखा जाता है।  जिसमे बालक की प्रवत्ति –   में दोस्त बनाना और दोस्ती को जी जान से निभाने की कोशिश करना पाया जाता है।  अतः इस अवस्था में बालक नए – नए दोस्त बनाता है।  इस प्रकार इस अवस्था में  बालक के समाजिक क्षेत्र बढ़ता है।  इस अवस्था में अभिभावकों को विशेष ध्यान देने की जरुरत होती है।  
किशोरावस्था
(3 ) शारीरिक और मानसिक विकास– इस अवस्था में बालक और बालिकाओं का शारीरिक और मानसिक विकास बहुत ही तीव्र गति से होता है। साथ ही उन्हें इस आयु में सही भोज्य पदार्थ लेने की आवश्यकता होती है , कियोकि ऐसा माना जाता है ,कि इस आयु में जैसा खान -पान होता है , उसका प्रभाव बालक की आयु पर जीवन -भर रहता है। 

किशोरावस्था की प्रमुख समस्या

 



 

(i ) नशा , अपराध की समस्या –  इस अवस्था में बालको के जीवन  में नशा , अपराध एवं विभिन्न तरह की समस्याओं को भी पाया जाता है। अतः  इस अवस्था में यदि बालको पर ठीक से ध्यान ना दिया जाए तो बालक -बुरी संगत  अथवा बहकावे में आकर – ” नशे की लत ” में पड़  जाते है , और अपने जीवन को नर्क से भी बदत्तर बना लेते है।  इस प्रकार इस अवस्था में हमे बालको को विशेष ध्यान  देने की जरुरत होती है।  
(ii)- तूफानी अवस्था  –       किशोरावस्था को जीवन की “तूफानी अवस्था ” भी कहते है।  कियोकि  इस अवस्था में बालक की मानसिक और शारीरिक स्थति और गतिविधिया ” तूफ़ान ” की तरह होती है।  यदि ऐसे समय में बालक को सही मार्गदर्शन ना मिले तो वो गलत संगत अथवा जानकारी की कमी के कारण – गलत दिशा में मुड़ जाता है। इसलिए इस अवस्था में बालक पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता होती है। इस अवस्था में निर्णय बिना सोचे – समझे लेने , परवाह ना करने , दूरगामी परिणाम ना देख पाने के कारण परेशानी का सामना करना पड़ता है।  इसलिए अभिभावकों को चाहिए की इस अवस्था में बालको  अकेलेपन के शिकार  होने दे ,  और समय – समय मार्गदर्शन करते रहना चाहिए।  इस अवस्था में बालको को तेज गुस्सा आना और फिर एक दम शांत हो जाना भी आम होता है। साथ ही इस अवस्था में बालको  के मित्रो ,आहार – व्यवहार आदि पर विशेष नजर रखना  चाहिए।  
 
(iii )संवेगो का तीव्र होना –  इस अवस्था में बालक के संवेगों का विकास बहुत तीव्र गति से होता है। इस प्रभाव यह होता है कि वह जो भी करता समझता है ,वह बहुत ही अधिकता लिए होता है। अर्थात अगर वह उग्र होता है , तो बहुत तीव्र गति से होगा। 
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